द्वापर युग के समय एक बार ब्रह्मा जी ने सोचा की क्यों न पृथ्वी पर चलकर भगवान श्री कृष्ण के दर्शन किया जाए, फिर उन्होंने सोचा कि पता नहीं उनके दर्शन हो भी पाएंगे या नहीं, लेकिन तभी उनके मन में एक आवाज़ आई जो उनके अहम की थी, जिसमे उन्होंने सोचा कि मैं तो ब्रह्मा हूं, और सृष्टि सृजन का कार्य करता हूं तो कहीं न कहीं मैं भी उन्हीं के बराबर हुआ, तो वो दर्शन क्यों नहीं देंगे, ऐसा सोच कर वो चल पड़े द्वारिका की ओर।
वहा पहुंचकर उन्होंने द्वारपाल अंदर जाने का आग्रह किया तो द्वारपाल ने कहा की ठीक है मैं प्रभु की आज्ञा लेकर आता हूं।

ब्रह्मा जी बोले की प्रभु से कहो की ब्रह्मा आए हैं।

द्वारपाल वापस आकर बोले की प्रभु ने पूछा है की आप कौन से ब्रह्मा हैं?

ब्रह्मा जी संकोच में पड़ गए और बोले की कौनसे ब्रह्मा का क्या मतलब, और कितने ब्रह्मा हैं, ब्रह्मा तो एक ही हैं। लेकिन फिर भी प्रभु से कहो कि चतुर्मुखी (चार मुख वाले) ब्रह्मा आए हैं।

द्वारपाल फिर से बाहर आए और बोले की आप अंदर जा सकते हैं।

ब्रह्मा जी अंदर पहुंचे तो प्रभु श्री कृष्ण अंदर आराम कर रहे थे, तो ब्रह्मा जी वहा पहुंचे और पहले प्रभु की स्तुति की और उनका वंदन किया। तत्पश्चात भगवान ने आने का कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि प्रभु दर्शनों की इच्छा थी सो मैंने सोचा कि आप के दर्शन करने चलूं, लेकिन प्रभु एक बात समझ नहीं आई आप के द्वारपाल ने मुझसे ऐसा क्यों पूछा कि आप कौन से ब्रह्मा है क्या मुझसे भी दूसरे कोई ब्रह्मा है?

ऐसा सुनकर भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुराने लगे और उन्होंने अपनी आंखें बंद करके अपनी योगमाया का पर्दा हटा दिया जिससे वहां अनेकों ब्रह्मा प्रकट हो गए किसी ब्रह्मा के 10 मुख, किसी के 100, किसी की हजार, किसी की लाख, किसी के करोड़, किसी के अरब और किसी के अनगिनत सिर थे यानी कि वह ब्रह्मा जितनी बडे ब्रह्मांड का सृजन करते थे उतने ही अधिक उनके मुख होते थे।

यानी कि जैसे हमारे ब्रह्मा चतुर्मुख थे तो हमारी सृष्टि भी छोटी है लेकिन जो 100 मुख वाले ब्रह्मा थे उनकी सृष्टि हमारी से कई गुना बड़ी होगी और जो हजार मुख वाले होंगे उनकी सृष्टि और भी बड़ी होगी इस प्रकार जितने अधिक मुख उतनी बड़ी सृष्टि….

ऐसा जानकर ब्रह्मा जी नतमस्तक हो गए और बोले प्रभु आपने मेरे अहम को नष्ट कर दिया, मैं तो यह सोचता था कि केवल सृष्टि में मैं ही ब्रह्मा हूं लेकिन आज मुझे पता चला कि अनंत ब्रह्मांड और ब्रह्मा आप के अधीन है, मुझे क्षमा कीजिए प्रभु ऐसा सुनकर भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुराए और उन्हें कहा कि केवल एक ही ब्रह्मांड नहीं अपितु सृष्टि में अनंत ब्रह्मांड है इन सब का संचालन मैं ही करता हूं।

इन सब का सृजन, संचालन और नाश सब मैं ही करता हूं ऐसा सुनकर ब्रह्मा जी नतमस्तक हो गए और प्रभु की स्तुति करते हुए वापस अपने लोक को लौट गए।

जय श्री कृष्ण ।।

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