पहले हम बात कर चुके हैं की ब्रह्मचर्य क्या है?आज बात करेंगे की क्या यदि हम कोई तप, साधना या गुरु के सानिध्य में योग न करें तो क्या इसका कोई लाभ नहीं, क्या केवल वीर्य संरक्षण का कोई मोल नहीं?नमस्कार दोस्तों, आज आप जानेंगे की वास्तव में संपूर्ण ब्रह्मचारी न बनने पर भी वीर्य संरक्षण के अनेकों लाभ होते हैं, जो भले ही हमे दिखाई नही देते लेकिन होते अद्भुत हैं।चूंकि ये हमारे शरीर का सार होता है यानी की हमारे संपूर्ण शरीर की ऊर्जा का सार या कहें की ये वही है जिसके आधार पर हम और आप खड़े हैं, या बात कर पा रहे हैं।

अब हो सकता है की कुछ लोग सोचे की ऐसे कैसे, हम तो बहुत वीर्य नाश करते हैं तो हमें तो मर जाना चाहिए था अब तक, लेकिन नहीं भाई, आपको ये महसूस ही नहीं है की ये हमारे शरीर में हर जगह विद्यमान है कही न कही, भले ही वो कम मात्रा में हो या कहें की न के बराबर मात्रा में हो लेकिन है अवश्य, और आपकी कमजोरी ही इस बात का प्रमाण है की आपके शरीर में इसकी कमी होती जा रही है, क्योंकि आपने देखा भी होगा कि जिन लोगों को ज्यादा आदत है नाश करने की, उनके शरीर में जगह जगह दर्द होना, हड्डियों से आवाज आना, आदि समस्या ही प्रमाण है कि ये रस उस स्थान से खत्म होता जा रहा है।

तो इसलिए भले ही आप इसका आध्यात्मिक जगत में इस्तेमाल न कर पा रहे हों लेकिन इसका मतलब ये बिल्कुल न निकलें की आपका वीर्य संरक्षण व्यर्थ है, नहीं बिलकुल नहीं….इसके तो भैतिक लाभ भी इतने हैं गिने नहीं जा सकते।उदाहरण: यदि आप इस संरक्षण सावधानी से करते हैं तो निम्न लाभ होने ही होने हैं:

० शरीर में एक अद्भुत बल का संचार रहेगा, आपके अंदर एक अलग ही ऊर्जा होगी जो आपको औरों से अलग दिखाएगी।

०आपके अंदर आत्मविश्वास की कमी कभी नहीं होगी, वरना इसका नाश करने वाले के भीतर आत्म विश्वास नहीं होता उसकी नजरें हमेशा शर्म से झुकी रहती हैं।

० इसके संरक्षण से शरीर की शुद्धि भी बहुत अच्छी होती है, एक अलग प्रकार की शुद्धता का आभास होता है वीर्य संरक्षित करने वालों को।

० यदि सम्पूर्णता से इसका पालन पच्चीस वर्ष की आयु तक किया जाए तो हमारी मेधा नाड़ी जागृत होती है जिससे हम जो चाहे केवल एक बार पढ़कर ही याद कर सकते हैं जैसे स्वामी विवेकानंद जी थे।

इसके प्रभाव से हमारा आभामंडल बेहतर होता है, वो चमकने लगता है, वो प्रभावशाली बन जाता, जिससे लोग हमारी तरफ यह तक की हमारे शत्रु भी हमारी ओर आकर्षित हुए बिना नहीं रह सकते।

०इसके संरक्षण से मनुष्य निर्भीक रहता है, या कहें की बड़े से बड़े परिस्थितियों में भी नही घबराता, और नही उसे किसी प्रकार का भय रहता है।०मस्तक पर तेज, ओज, ये सब उसे खुद ही मिल जाता है, शारीरिक सुंदरता को बनाने वाली किसी भी प्रकार की औषधि उसे नहीं रह जाती।

०सबसे बड़ी बात की इसका पालन करने वाले की मानसिक क्षमता इतनी बढ़ जाती है, की उसकी छोटी छोटी इच्छाएं तो केवल उसके संकल्प से ही पूरी होने लगती हैं।

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