यजुर्वेद सनातन धर्म में एक बहुत ही महत्वपूर्ण और चारों वेदों में से एक है इस वेद के अंदर यह कि की प्रक्रियाएं संपन्न करने के लिए गद्य और पद्य मंत्र किए गए हैं।

यह सनातन धर्म के चार मुख्य वेदों में से एक है इसकी महत्वता के अनुसार इसे ऋग्वेद यानी सबसे प्राचीनतम वेद के बाद दूसरा वेद माना जाता है।

यह वास्तव में संस्कृत के मंत्र और छंद का प्राचीन संग्रह है जिसका प्रयोग सनातन धर्मी या हिंदू लोग पूजा और अनुष्ठानों में करते हैं।

यजुर्वेद का नाम यजुर्वेद संस्कृत की जड़ों से किया गया जिसमें *यजुर*  का तात्पर्य होता है ” पूजा या त्याग ” और *वेद* जिसका अर्थ होता है “ज्ञान”। यजुर्वेद को कभी-कभी बलिदान ज्ञान के रूप में भी अनुवादित कर दिया जाता है।

इसमें 40 अध्याय तथा 3988 मंत्र है यहां तक कि विश्व विख्यात तथा अत्यंत लाभकारी और चमत्कारी मंत्र ” गायत्री मंत्र तथा महामृत्युंजय मंत्र ” भी इसी की देन है।

यजुर्वेद की मुख्य दो शाखाएं होती हैं जिनमें से एक है शुक्ल यजुर्वेद और दूसरा है कृष्ण यजुर्वेद कृष्ण आयुर्वेद की 85 शाखाओं का वर्णन मिलता है, लेकिन आज के समय में 4 ही उपलब्ध हो पाई है जो की तैत्तिरीय, मैत्रायणी, कठ तथा कपिस्ठकल – कठ शाखा।

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